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नाटक की सफलता उसकी रचनात्मकता पर निर्भर करती है – हरीश खेत्रपाल

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आज आपकी मुलाकात करवाते हैं अपने बैंक की नौकरी से रिटायर हो चुके रंगमंच के कलाकार हरीश खेत्रपाल से।रंगमंच से जुड़ने का उनका पहला अनुभव कक्षा 8 मिशन स्कूल में ही प्राप्त हो गया था। काफी समय रंगमंच से दूरी होने के बावजूद भी मन से दूर कभी नहीं कर पाए।राजकीय महाविद्यालय गुरुग्राम में युवा उत्सव के दौरान सूचना पट पर नाटक में भाग लेने की सूचना ने एक बार फिर से उनका रुख रंगमंच की ओर मोड़ ही दिया।वरिष्ठ रंगकर्मी महेश वशिष्ठ के निर्देशन में हरीश ने नाटक ” बकरी ” में कर्मवीर का किरदार निभाया जिसे काफी सराहा भी गया और नाटक ने अंतर्राज्यीय महाविद्यालय युवा उत्सव तक का सफ़र तय किया । जहां नाटक को बेस्ट आयटम ऑफ फेस्टिवल के विशेष पुरस्कार से नवाजा गया। नाटक ” बकरी ” को इतना पसंद किया गया कि इसका एक रिपीट शो टैगोर थियेटर चंडीगढ़ में किया गया। कॉलेज के बाद हरीश खेत्रपाल बैंक की नौकरी करने के साथ साथ सांस्कृतिक कार्यकर्मों से जुड़े रहे।इसके बाद वर्ष 1985 में कल्चर ग्रुप 85 के संस्थापक सक्रिय सदस्य भी रहे जिसके अन्तर्गत नाटक ” दो मसखरों की महारानी ” ,  ” आजादी की कहानी ”  आदि नाटकों में  निर्देशक जे बी सिंह के निर्देशन में अभिनय किया । आजादी की कहानी नाटक में करीब 70 के लगभग किरदार जिनके द्वारा पूरी आजादी की गाथा को दर्शाया गया था और इस नाटक हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित किया गया था।फिर कुछ सालों के बाद नाटक ” महाकल्प ” में अभिनय किया जिसके लेखक व निर्देशक थे जे बी सिंह और इस नाटक के तीन शो श्री राम सेंटर दिल्ली में ही हुए।अपने रंगमंच की इस यात्रा में एक बार फिर नाटक ” बड़ा साहब “, ” खीर ” व ” कौवा चला हंस की चाल ” आदि नाटकों में निर्देशक महेश वशिष्ठ के साथ काम करने का अवसर मिला। निर्देशक अरुण मारवाह के साथ ” इडिपास ” सरीखे नाटक में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी।हरीश खेत्रपाल की माने तो नाटक की रिहर्सल के दौरान उन्हें बेहद आनंद आता था। नाटक की सफलता उसकी रचनात्मकता पर निर्भर करती है।हरीश ने बताया कि रिटायरमेंट के बाद वे शीघ्र ही अभिनय की दूसरी पारी खेलने को तैयार हैं।उन्होंने बताया कि एक फिर से महेश वशिष्ठ के निर्देशन में ” अब के मोहे उबारो ” नाटक से उनका रंगमंच रिटर्न देखने को मिलेगा।

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