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क्या हो तुम?
प्रेम, अभिव्यक्ति, अभिलाषा,
या अव्यक्त परिभाषा,
या फिर मात्र एक लालसा,
तपते हृदय में प्यार की फुहार,
चंचल आँखों की स्थिरता,
बेवक्त की पुकार,
अनचाहा, अनदेखा एहसास,
क्या हो तुम?
मेरे नहीं हो फिर भी मेरे हो,
दूर बहुत हो फिर भी दूर नहीं हो,
आत्मा से, मन से, खुशी से,
और गम से अजीब से बंधे हो,
बंध तो गए हो,
पर मजबूरी से नहीं, आजादी के जंजीर से,
रिश्ता बेहतरीन है, तभी तो बेनज़ीर है,
ना पाने की चाहत है,
ना खोने का डर,
ना वक़्त की पाबंदी,
ना जुदाई का डर,
तुम बस मेरे खातिर हो,
इस एहसास के एहसास में जीना,
उफ…..कितना खूबसूरत है ये ख्वाब ,
और कितना खूबसूरत है,
इस ख्वाब में रहना,

लेकिन ये क्या!
उषा की लालिमा में,
कहीं कुछ खो रहा है ,
धुंधली हो रही है छवि,
शायद कोई दूर हो रहा है,
झपट पड़ी मैं खातिर पकड़ने को,
लेकिन ! लेकिन! ये तो चांद है जो,
सिरहाने से फिसलता हुआ,
कहीं दूर जा रहा है,
बड़ा खूबसूरत सा,
बड़ा मगरूर लग रहा है,
नींद में थी शायद,
फिर भी मुस्कुरा बैठी,
किसी के बहुत करीब थी मैं,
कोई बहुत करीब था मेरे,
वो अहसास वो आभास,
किसी के बांहों में जाने की तड़प,
वो बेमतलब बेवजह की कसक,
था तो कुछ जरूर,
तो कहो ना,
क्या हो तुम?

करुणा कलिका


करुणा कलिका,कवयित्री गीतकार व ग़ज़लगो, बोकारो स्टील सिटी- झारखंड.
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