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संगीत मेरे लिए रब की इबाबत करने जैसा है – अवतार सिंह राणा

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आज हम आपकी मुलाकात करवा रहे हैं एक ऐसे फनकार से जिनके प्राण बसते हैं ढोलक और तबले की थाप में, जी हां उनका नाम है अवतार सिंह राणा। वैसे आपको बता दें उन्हे राणा के नाम अधिक लोग जानते हैं बनिस्पत पूरे नाम के। उन्होंने बताया कि उनके पड़ोस में संगीत के शिक्षक पंडित लेख राज रहते थे तो उनके घर से ढोलक, तबले और हारमोनियम की संगीत लहरियां जब निकलती थीं तो बरबस ही उनको अपनी ओर आकर्षित कर लिया करती थीं।इसी के चलते उनका झुकाव संगीत के प्रति होने लगा। परिणाम ये रहा कि जो कुछ वो देखते सुनते उसी का अनुसरण खाली समय में स्कूल की टेबल पर किया करते और उनके इर्द गिर्द काफी छात्र इकट्ठे होकर गाना गाते और वो बजाते।उनकी लगन और पंडित लेखराज के दिशा निर्देश के चलते उनकी थाप ने अपना कमाल दिखाया और उन्हे सब से पहले रामलीला में अपना हुनर दिखाने का मौका मिला जिस पर वो खरे उतरे। धीरे धीरे वो जागरण व कई सांस्कृतिक समारोहों में अपनी इस संगीत कला के लिए पहचाने जाने लगे। नतीजा ये रहा कि वो एक स्थापित ढोलक व तबला वादक के रूप में अपनी सेवाएं देने लगे।कॉलेज के जोनल यूथ फेस्टिवल से आरंभ उनकी इस संगीत यात्रा में कई पड़ाव आए और गए जिसमें उनकी उपस्थिति में विभिन्न कॉलेजों में छात्रों ने कई पुरुस्कार भी अर्जित किए।

इसी कड़ी में उन्होंने कई नाट्य संस्थाओं के साथ शिमला सोलन व अन्य अखिल भारतीय नाट्य प्रतियोगिताओं को अपने संगीत से सजाया।गुरुग्राम के शुरुआती दौर में सभी नाट्य समूहों में विशेषकर संगीत आधारित नाटकों में अपनी संगीत कला की भूमिका को पूरी ईमानदारी से निभाया।अवतार सिंह राणा ने बताया कि उन्होंने कई नाटकों में संगीत में संगत कि जिनमे से सैंया भए कोतवाल, दो मसखरों की महारानी, भागवत अजुकम, पोस्टर, बकरी, कुमार स्वामी, बाबू भाई बिगड़ गए व कई और नाटक शामिल हैं।जब उनसे पूछा गया कि संगीत उनके लिए क्या है तो उन्होंने बताया कि संगीत रब की इबाबत करने जैसा है, उसकी पूजा करने का जरिया है।

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