क्या सही मायने मे आज़ाद हो पाए है हम?

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15 अगस्त का दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसी दिन सन् 1947 को भारत देश को ब्रिटिश राज की गुलामी से स्वतंत्रता प्राप्‍त हुई थी मगर देश का विभाजन कर पाकिस्‍तान मुल्क खड़ा कर दिया गया. स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने लोकतान्त्रिक तो पाकिस्‍तान ने मुस्लिम राष्ट्र की रह पकड़ी। आवाम को अपने घरो को छोड़ना पड़ा. कत्लो आम का सैलाब उठा जिसकी भरपाई आज के दिन तक नही हो पाई है. आज भी जनता के जख्म हरे हैं. जम्मू-कश्मीर का मसला तभी से बना रहा. दोनो देशों में 14 और 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है मगर आपसी रंजिशे बढ़ती जा रही है. आज के समय को मद्दे नजर रख ये कहना कतई गलत नही होगा की आवाम/जनता को स्वतंत्रता की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी.

स्वतंत्रता से अभिप्राय आजादी से होता है. पिंजरे में कैद जीव आजादी की कीमत को समझता है. गुलाम देश की यही स्थिति होती है. भारत को आजाद हुए 70 साल से अधिक समय हो गया है. इस दौरान में बहुत से बदलाव आए और आज देश डिजिटल इंडिया बनने की ओर अग्रसर है, मगर भ्रष्टाचार की गिरफ्त से निकल नही पाया. यह बहुत विचारणीय है कि जिस स्वतंत्रता के लिए लड़ाईयां लड़ी गई और जिस स्वतंत्र देश की कल्पना की गई थी वो आज के संदर्भ में कितना सार्थक है. भारत एक विशाल लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राज्य है. जहां देश की बागडोर जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को दी जाती है. जहां हिन्दु राष्ट्र होने के बावजूद धर्मनिरपेक्षता के अन्तर्गत सभी धर्मो के लोग समान अधिकार के साथ रह सकते है. मगर विंडम्बना ये कि संपूर्ण देश को भ्रष्टाचार रूपी दीमक लगी हुई है, जिसके चलते कोई भी व्यवस्था प्रणाली कामयाब नही हो पाती. नीचे से लेकर उपर तक व्यवस्था की कड़ी में सभी अपनी स्वार्थ पूर्ति में लगे है. यहां तक की देश की बागडोर संभालने वाले, धर्म-जाति की वोट बैंक की राजनीति खेल अपने ही स्वार्थ की पूर्ति करते दिखाई पड़ते है. राजनीति को एक गंदे खेल की दृष्टि से देखा जाता है. पक्ष विपक्ष की राजनीति में आरोपो का सिलसिला चलता रहता है और जनहित को दरकिनार कर दिया जाता है. आवाज उठाने वालों को दबा दिया जाता है. क्या यही स्वतंत्रता है?

हमने बाहरी लोगों से तो आजादी पा ली मगर अपनी संकीर्ण सोच, भ्रष्टाचार, धार्मिक मतभेद तथा अन्य कई कुरितियों से आज भी आजाद नही हो पाए है. सच्चाई ये है कि देश का हर व्यक्ति अपना परिचय अपने प्रातं जाति धर्म से ही देता है, ऐसे कितने लोग है जो अपने को सिर्फ और सिर्फ भारतीय कहते है. देश के नागरिक अपने अधिकारों को लेकर सजग है मगर अपनी जिम्मेवारियों से मुंह फेरे बैठे है. हर बात के लिए केवल व्यवस्था को आरोपि ठहरा अपना पल्ला झाड़ लेते है. देश की बागडोर सही हाथों में जाए इसका दायित्व भी आवाम/जनता का ही है. आधुनिकीकरण के समय में मानवता का स्तर खत्म होने की कगार पर दिखाई पड़ता है. इंसान और इंसानियत की कीमत गिर गई है और पैसे की दौड़ ने रफ्तार पकड़ रखी है. आज कानून से खेलना कोई बड़ी बात नही रही. देश की वर्तमान स्थिति चिंता का विषय है. आवाम/जनता, मानसिक, शारिरिक और आर्थिक सभी तरह से विक्षिप्त हो चुकी है. स्वतंत्रता का आधार जिम्मेवारी होती है, जब तक देश के राजनेता और देश की जनता अपनी अपनी जिम्मेवारी के प्रति सजग नही होंगे ना तो देश भ्रष्टाचार की दीमक से छुटकारा पा सकेगा और ना ही स्वतंत्रता के लिए हुए शहीदों का सही मायनों में मान हो पाएगा.

जिस दिन स्वतंत्र भारत का प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के अपनी मूलभूत जरूरतो को पूरा कर खुशहाल जीवन जीने में समर्थ होगा, उस दिन होगा मुकम्मल स्वतंत्र भारत.

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