जब परशुराम लाये थे कावड़

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PHOTO: KARAMVIR KAMAL

पिछले दो दशक से कावड़ यात्रा अत्याधिक लोकप्रिय तथा चर्चा का विषय बनी रही है। प्रत्येक वर्ष श्रवण मास का आंरभ होते ही कावड़िये यात्रा पर निकल पड़ते है। इस यात्रा के दो पहलू है। एक धार्मिक तथा दूसरा सामाजिका जो विचारणीय है। हिन्दु समाज और संस्कृति में धर्म तथा अस्था का एक विशेष स्थान है। जिसके अनुसार हर मास, दिन नक्षत्र आदि का अपना महत्व है। हिन्दु धर्म में भगवान शिव की विशेष महत्वता है। ब्रह्मा जिन्हे सृष्टि का रचेता माना जाता है, विष्णु जिन्हे पालक तथा शिव जिन्हे विनाशक माना जाता है, दूसरी और ये मान्यता है की शिव ही सत्य है अर्थात शिव ही सृष्टि का दूसरा रूप है।

श्रवण मास में उतर भारत में शिव की आरधना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि श्रवण मास के चार सोमवार में किए जाने वाले उपवास तथा शिव अराधना का फल विशेष होता है। कावड़ यात्रा का आयोजन भी गंगा जल के द्वारा शिव अभिषेक के लिए ही किया जाता है। अपने अपने शहरो से आस्था रखने वाले लोग कावड़ ले गंगा जल लाने को निकल पड़ते है तथा श्रवण की चतुर्दशी को वापसी कर उस पवित्र गंगा जल से अपने अपने शहर के शिव मंदिरों में शिव अभिषेक करते है। गंगा जिसे शिव ने अपनी जटाओं में स्थान दिया पावन तथा पवित्र नदी का स्थान रखती है। कावड़ यात्रा की शुरूआत को लेकर विभिन्न कथाओं का प्रचलन है, जिसके अनुसार कावड़ यात्रा की शुरुआत परशुराम जी ने की थी। बागपत से गंगा जल ला मुक्तेशवर में शिव अभिषेक किया था। दूसरी कथा के अनुसार इसकी शुरूआत श्रवण कुमार द्वारा अपने, मां बाप की गंगा स्नान की इच्छा को पूर्ण करने से हुई थी। वह ऊना से हरिद्वार गए थे। एक मत ये है कि इसकी शुरूआत भगवान राम ने की थी तो दूसरा मत ये कहता है कि इसकी शुरूआत शिव के महा भक्त रावण द्वारा की गई थी। एक अन्य मत के अनुसार देवताओं ने समुंद्र मंथन के समय शिव द्वारा पिये गए विष के नाकारात्मक प्रभाव को खत्म करने के लिए शिव पर गंगा जल डाला था, तभी से यह प्रचलन शुरू हुआ। कथा कोई भी हो मकसद शिव की अराधना है ताकि सृष्टि खुशहाल रहे।

PHOTO: KARAMVIR KAMAL

श्रवण मास जिसे सावन भी कहा जाता है, बारिश का मौसम, जब मेघ बरस कर भीष्म गरमी से तपती धरती को राहत पंहुचाते है। गांवो में फसले बीजी जाती है, झूले डाले जाते है पशु-पक्षी, पेड़-पौधों, संपूर्ण सृष्टि चहक उठती है। सामाजिक दृष्टि से ये यात्रा पानी के महत्व से जोड़ी है। पानी के बिना जीवन की कल्पना करना असम्भव है। कावड़ियों द्वारा पद यात्रा कर हरिद्वार से गंगा लाना, पानी के संजोने अर्थात इकट्ठा करने को दर्शाता है। आज के समय मे जब धरती पर पानी की कमी महसूस होने लगी है, ऐसे कई प्रदेश है जहां पीने का पानी उपल्बध नही। लोगो को दूर दराज तक पानी के लिए चल कर जाना पड़ता है। यदि सही नजरिए से किसी भी व्यक्तवय या कथा को समझा जाए तो वह मानव को सृष्टि के महत्व और उससे जोड़ने का ही संदेश देती है। कावड यात्रा भी पानी के महत्व से जोड़ी है। शिव की आराधना तभी सफल होगी जब मानव पानी के महत्व को समझेगा, क्योंकि पानी ही जीवन का सृजन करता है।

किसी भी धार्मिक यात्रा का उद्देश्‍य सफल केवल मेले लगाने या भीड़ को आस्था के नाम पर बिना उसकी सार्थकता और महत्व को समझे इकट्ठा करने या अन्य लोगों के जीवन को अस्त व्यस्त करने से नही हो सकता। आज धार्मिकता के नाम पर कावड़ियों के लिए रास्ते भर तथा हरिद्वार में विशेष सुविधाओं का विशेष आयोजन किया जाता है। जिसका हिस्सा वो लोग भी बन जाते है जिनका ना तो धर्म, मानवता और समाज से कोई सरोकार होता है। कुछ लोग सिर्फ सुविधाओं का लाभ लेने तथा धार्मिक राजनैतिक खेल का हिस्सा बन शामिल होते है, जो न्याय संगत नही। धर्म केवल मानवता सिखाता है। कोई भी कर्मकांड जो दूसरो को तकलीफ दे, मानव को मानव से अलग कर स्वार्थी या नफरत का बीज बोए वह सृष्टि के विरोध है। शिव की आराधना सृष्टि के मूल्यों को समझने तथा संजोने में है।

ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है…

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