दिल्ली मेट्रो: कहीं छूट मे बहुत कुछ तो नहीं छूट रहा…

जब हम समानता की बात करते हैं तो उसका अर्थ है हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान दृष्टि से देखना चाहे वह लिंग भेद हो या कुछ भी. एक तरफ तो सरकार मैट्रो तथा अन्य यातायात के किराए बढ़ाती जा रही है दूसरी तरफ वह महिलाओ को निःशुल्क मैट्रो सुविधा देने की बात करती है. ऐसा क्यों?

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दिल्ली एक मैट्रो पौलिटेंट सिटी है. देश की राजधानी. दिल्ली के लोगो की अपनी एक पहचान है. ऐसे में बात अगर दिल्ली की महिलाओ की की जाए तो दिल्ली की महिलाएं स्वालंमभि और आधुनिक मानी जाती है. पढी लिखी, तेज-तरार स्वतंत्र सोच की महीलाएं जो आदमी के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है. बल्कि यदि कहे की वह पुरूषों से हर एक क्षेत्र में आगे निकल गई है तो गलत नही होगा. आज कल दिल्ली मैट्रो के किराए पर महिलाओ को छूट देने का मुद्दा गरमाया हुआ है. जो राजनीतिक खेल का हिस्सा है. क्या महिलाएं समाज और सरकार से मात्र इस तरह की छूट की अपेक्षा रखती है? क्या इस तरह की सुविधाओं से नारी इस कुंठित समाज में सुरक्षित हो जाएगी? क्या है एक नारी की अपेक्षा इस समाज और सरकार से इस पर गहन अध्यन करने की आवश्यकता है.

जब हम समानता की बात करते हैं तो उसका अर्थ है हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान दृष्टि से देखना चाहे वह लिंग भेद हो या कुछ भी. एक तरफ तो सरकार मैट्रो तथा अन्य यातायात के किराए बढ़ाती जा रही है दूसरी तरफ वह महिलाओ को निःशुल्क मैट्रो सुविधा देने की बात करती है. ऐसा क्यों? किसी भी व्यवस्था को चलाने के लिए पैसे की आवश्यकता होती है, जो आवाम से कर के रूप मे लिया जाता है. फिर इसका भार बराबर सभी पर होना चाहिए. आज की आधुनिक महिलाएं कामकाजी है. यदि आम जनता के हित में कुछ करना है तो सभी के लिए किराया कम कर देना चाहिए ताकि उसका लाभ बराबर सभी को मिल सके. किसी भी चीज का महत्व तभी रहता है जब उस पर कुछ लागत लगती है. वरना आज समाज में हर व्यक्ति को सुविधा चाहिए बिना किसी लागत के. वैसे तो मेट्रो और बसो में महिलाओ के लिए सीट आरक्षित करने की आवश्यकता भी नही होनी चाहिए. हम एक सभ्य समाज की बात करते हैं जहां एक व्यक्ति को दूसरे की तकलीफ़ का अहसास होना चाहिए. जिसके चलते सफर करने वाले हर व्यक्ति के चाहिए की वह पुरूष हो या स्त्री अपने से बड़े और जरूरतमंद को बैठने की जगह दे. बात समानता की है. सब को बराबर सुविधा मिलनी चाहिए तथा हर व्यक्ति को अपना समाज के प्रति उतरदायित्व को समझना चाहिए.

यदि सरकार महिला सक्षतिकरण के तहत कुछ करना चाहती है तो बजाए मैट्रो सुविधा फ्री करने के ऐसी व्यव्स्था, कानून बनाए, जिनके रहते वह हर समय हर जगह सुरक्षित महसूस करे तथा बिना खौफ़ के किसी भी समय आ जा सके. सड़कों पर जगह जगह सी सी टी वी कैमरा लगवाएं जाए. स्कूल कॉलेजो में लड़कियों के लिए सेल्फ डिफेंस अनिवार्य किया जाना चाहिए. अधिक स्कूल, कालेजों की व्यवस्था की जाए जहां निशुल्क शिक्षा प्राप्त हो सके. जिसका लाभ सभी को समान रूप से मिल सके. विधवा शुल्क बढ़ाया जा सकता है. असहाय स्त्रियों के लिए रहने की जगह और रोजगार उपलब्ध करवाए जांए. ऐसे बहुत से विशेष है जिस पर सरकार द्वारा काम किए जाने की आवश्यकता है. एक नारी होने के नाते मैं समझती हूं कि हर व्यक्ति की तरह नारी को समाज और सरकार से समानता के अधिकार के तहत सर उठा कर सुरक्षित जीवन जीने की अपेक्षा है.

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