साहित्य का रुख समाचार की ओर

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यह निर्विवाद सिद्ध है कि साहित्य समाज का दर्पण है किन्तु इससे भी इंकार नही किया जा सकता कि साहित्य समाज का पथ प्रेरक भी है। दोनों का दोनों पर असर है। इक्कीसवीं सदी की सूचना क्रांति ने इस सम्बंध को और भी प्रगाढ़ एवं त्वरित प्रभावकारी बनाया है। क्षण मात्र में साहित्य का प्रकीर्णन समाज में हो जाता है और समाज की आकांक्षायें व सूचनायें साहित्य में सम्मिलित हो जाती हैं।

हिंदी साहित्य का प्रारम्भिक दौर काव्य का था जिसमें कवि राजदरबारी होते थे और कविताओं का विषय आश्रयदाता राजाओं को महानायक बनाना होता था। चंदबरदाई और जगनिक जैसे कवि सुविख्यात थे। आम जनता और उसका दु:ख दर्द काव्य से बेहद दूर था। फिर समय बदला और काव्य का नायकत्व आश्रयदाता राजाओं की जगह परमसत्ता ने लिया। राम, कृष्ण, ब्रह्म और भगवान आदि महानायक बने। भक्त और भगवान के मध्य विविध रिश्ते तय किये गए किन्तु जनता और जन समस्या से काव्य का सरोकार नहीं बन सका। कबीर, जायसी, सूर व तुलसी भक्ति काल के शीर्ष थे।

कालान्तर में बदलाव के साथ काव्य का झुकाव श्रृंगार व रीति की ओर हुआ। पुन: आश्रयदाता राजा और रानी महानायक और महानायिका बने। काव्य दरबारों का मनोरंजन बना। घनानंद, केशव, बिहारी एवं सेनापति उन्नायक बने। किन्तु इसी समय राष्ट्रवाद की गूँज आश्रयदाता राजा और प्रजा के मध्य पनपने लगी थी। इसके बावजूद भी जनता एवं जन समस्या का जुड़ाव काव्य के साथ न के बराबर ही रहा।

वैश्विक क्रान्ति एवं पुनर्जागरण काल के साथ साहित्य दरबारों से बाहर निकलने लगा। कवियों की कलमें हुंकार भरने लगीं। सामूहिक जन समस्यायें साहित्य का विषय बनने लगीं। साहित्य में गद्य का आविर्भाव हुआ। भारतेन्दु, महावीर, शुक्ल, पंत, निराला, दिनकर और प्रेमचंद सरीखे साहित्यकारों में आजादी की छटपटाहट दिखी। गरीबी और गुलामी के खिलाफ आवाजें बुलंद हुईं और 1947 में देश आजाद हुआ। आजादी मिलने के साथ साहित्य के विषयों में विविधता एवं व्यापकता का प्रवेश हुआ।

साहित्य प्रमुखत: दो दिशाओं में समानान्तर चलने लगा। एक धड़ सत्ता के साथ तो दूसरा धड़ सत्ता के खिलाफ़। इन दोनों का कमोवेश लक्ष्य परोक्षत: जनता का समर्थन लेकर सत्ता के गलियारे में घुसना रहा है और इसी उद्देश्य से जनता और जनसमस्या याद आते रहे हैं। विश्वविद्यालयी राजनीति और खेमेबाजी से शायद ही कोई अपरिचित हो। राहुल सांकृत्यायन इलाहाबाद में पाँव नहीं जमा सके। दिनकर जी को बारम्बार कठघरे में खड़ा किया जाता रहा। साहित्य अकादमियों में भागीदारी के हर सम्भव प्रयास किये जाते रहे हैं। यह अवधारणा उसी प्रकार दो मुँही है जैसे अधिकांश समाजवादी पूँजीवाद का विरोध करके पूँजीपति बनना चाहते हैं। आधुनिक साहित्यकारों ने साहित्य में टिके रहने के लिए पहले देश की बड़ी – बड़ी खबरों को साहित्य की कई विधाओं में पिरोया। स्त्री विमर्श, कृषक विमर्श और अब पुरुष विमर्श आदि को खोज निकाला। इन पंक्तियों से इसके तह तक पहुँचना सहज होगा-

‘सत्ता की चौखट पर बोल बदलते देखा,
गिरहबान के हाथ चरण पर धरते देखा।’

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने संचार क्रान्ति को व्यापक बनाया। बड़ी खबरों की लूट के बाद छोटी खबरों की लूट होने लगी है। आज कोई भी घटना घटित होती है तो उससे सम्बंधित कुछ ही पलों बाद कुछ कवितायें या लघुकथायें समाचार के स्वरूप में आ जाती हैं। यह एक तरह से उचित भी है क्योंकि यह भी साहित्य – समाज के रिश्ते का अंग है। इससे साहित्य की नज़र पैनी और व्यापक हुई है। देश व समाज की छोटी से छोटी गतिविधियाँ साहित्य के दायरे में आई हैं। यह साहित्यकार की सजगता और सामयिक बोध की सूचक है।

तथाकथित साहित्यकारों से सुसज्जित कवि सम्मेलनों ने साहित्य की वास्तविक पहचान ही बदल डाली। ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ या ‘कुकुरमुत्ता’ जैसी कविताओं की जगह पति-पत्नी-प्रेमिका जनित चुटकुलों ने ले लिया। प्रबुद्ध श्रोता भी दूर होते गए। जनता को जोड़ा तो गया मगर घड़ियाली आँसू बहाकर। असाहित्यिक आयोजकों के हाथ में कठपुतली बनकर रह गये हैं कवि सम्मेलन जहाँ ‘रूप की कुछ परियों से प्रेमगीत के बहाने नोक- झोक कराना अनिवार्य हो गया है। बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि कवि सम्मेलन और ऑर्केस्ट्रा में ज्यादा भेद अब नहीं रहा।

जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही इसके भी दो पहलू हैं। अब नकारात्मक पक्ष को लें तो साहित्य जब से खबर पर आधारित या दूसरे शब्दों में, आश्रित हुआ है तब से क्षणभंगुर हो गया। साहित्य की विशेषता जो कभी ‘कालजयी’ हुआ करती थी, अब खो गई। जिस तरह सुबह का अखबार नये सूर्योदय के साथ बासी हो जाता है उसी प्रकार से साहित्य भी हर नई सुबह के साथ बासी होने लगा है। समुद्री ज्वार- भाटे की तरह आगमन और प्रस्थान त्वरित हो गया है।

प्रबुद्ध साहित्यकारों को चाहिए कि इसकी मीमांसा करें। साहित्य को क्षणभंगुर होने से बचाएँ। कुछ ऐसा रचें जो वर्षों तक अपनी प्रतिष्ठा और औचित्य के साथ कायम रह सके। अगर साहित्य ऐसे ही खबरोन्मुख रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इसका अस्तित्व दैनिक अख़बार में छपी किसी खबर से अधिक नहीं होगा। इस सम्बंध में यह मुक्तक समीचीन होगा-

‘अखबारों की खबरों में कविताई है।
कविता सुबह खबर बनकर के आई है।
शाम ढले दोनों को ही खो जाना होगा-
हाय! राह किसने ये गलत दिखाई है!’

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