तेलंगाना असेंबली भंग करने के सियासी मायने क्या हैं

श्रीराम गोपीशेट्टी संपादक, बीबीसी तेलुगू सेवा

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तेलांगना विधानसभा को भंग कर दिया गया है. मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की अनुशंसा को राज्य के राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन ने स्वीकार कर लिया है.

हालांकि राज्यपाल ने केसी राव को केयरटेकर मुख्यमंत्री के तौर पर बने रहने को कहा है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि तेलंगाना विधानसभा को क्यों भंग किया गया?

तेलंगाना विधानसभा के चुनाव, 2014 की लोकसभा चुनाव के साथ हुए थे. आंध्र प्रदेश से विभाजन के बाद राज्य में पहली सरकार के चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में 2 जून, 2013 को बनी.

ऐसे में सरकार के कार्यकाल के अभी पूरे नौ महीने बाक़ी थे पर मुख्यमंत्री ने विधानसभा को भंग करने की सिफ़ारिश कर दी है.

राज्य में चुनाव कब होगा, इसका फ़ैसला चुनाव आयोग को लेना है. इसमें केंद्र सरकार की भूमिका भी होगी. आमतौर पर केसी राव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन साथ ही वे प्रधानमंत्री के साथ अपने संबंधों को अच्छा भी रखने की कोशिश करते रहे हैं.

ये प्रधानमंत्री के रवैये से ज़ाहिर भी हुआ है, ख़ासकर संसद के अंदर अविश्वास प्रस्ताव के दौरान आंध्र प्रदेश को स्पेशल स्टेट्स देने के मुद्दे पर. साथ ही उन्होंने केसीआर की तारीफ़ भी की. विधानसभा को भंग करने से पहले केसीआर ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से भी मुलाकात की.

ये माना जा रहा है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनाव के साथ राज्य में दिसंबर में चुनाव कराए जा सकते हैं.

रणनीति क्या है?

एक सवाल ये भी है कि क्या नौ महीने पहले विधानसभा भंग किया जाना जनता के पैसे की बर्बादी है?

केसीआर चाहे जो भी वजह गिनाएं, इसकी सबसे बड़ी वजह राजनीतिक है.

ये माना जा रहा है कि केसी राव अब केंद्र की राजनीति में आना चाहते हैं. वो केंद्र में एक अहम मंत्रालय चाहते हैं और अपने बेटे के तारक रामा राव को राज्य की कमान सौंपना चाहते हैं.

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव कम हो रहा है और कांग्रेस अपने बलबूते सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आ पाएगी.

केसीआर

इस वजह से, कई क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेता ख़ुद की भूमिका केंद्र में देख रहे हैं और देवगौड़ा का उदाहरण भी सामने है.

दरअसल, केसीआर चाहते हैं कि राज्य की राजनीति उनके चेहरे के इर्द-गिर्द घूमती रहे, इसलिए भी उन्होंने पहले चुनाव कराने का फ़ैसला लिया है. दिल्ली में भी उन्होंने इमेज बिल्डिंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया है लिहाजा तेलंगाना के विकास के दावे वाले होर्डिंग्स राजधानी की सड़कों पर दिखाई देते हैं.

अगर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हों तो पूरा फ़ोकस नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी पर टिका होगा और राष्ट्रीय मुद्दे ही एजेंडा तय करेंगे. तब राज्य का कोई नेता एजेंडे को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होगा.

इस क़दम से केसीआर की इमेज को कोई फ़ायदा होगा ही, ये भरोसे से नहीं कहा जा सकता, इतना ही नहीं सीटों को लेकर इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है.

अगर तीन राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है तो तेलांगना में कांग्रेस की स्थिति मज़बूत हो सकती है. तेलंगाना में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है.

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक केसीआर ज्योतिष और मुहूर्त में बहुत भरोसा है, लेकिन यही मुख्य वजह नहीं रही होगी.

मोदी-अमित शाहGETTY IMAGES

अगर वे विधानसभा चुनाव में कामयाबी हासिल कर लेते हैं और लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य में उनकी सरकार होती है, तो वे अपना प्रभाव दिखा सकते हैं, ऐसी सूरत में वो ज़्यादा सीटें हासिल कर सकते हैं और उसके बाद केंद्र में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

केसीआर के बेटे केटीआर पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि राज्य की 17 सीटों में (असद्दुदीन ओवैसी की चारमीनार सीट छोड़कर) 16 उनकी पार्टी जीतेगी.

उधर कांग्रेस भी अपनी रणनीति को लेकर तैयारी में जुटी है और तेलंगाना की हवाओं में चुनावी फ़िज़ा तैरने लगी है.

जनकल्याण योजनाओं पर भरोसा

केसीआर और दूसरे नेताओं का मानना है कि तेलंगाना राष्ट्र समिति मज़बूत स्थिति में है. इन लोगों का मानना है कि जन कल्याण योजनाओं का फ़ायदा उन्हें मिलेगा और लोग उन्हें ही चुनेंगे. केसीआर रायथू बंधु योजना पर सबसे ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं. ज्यादातर अर्थशास्त्रियों के मुताबिक खेती-किसानी के क्षेत्र के लिए ये एक आदर्श योजना है, इसमें लाभार्थी को सीधे आर्थिक सहायता मिलती है.

इसकी प्रशंसा केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी की है और इसे पूरे देश में लागू करने जैसी नीति बताया है.

कर्ज माफ़ी और मुफ़्त बिजली के अलावा इस योजना में प्रति सीज़न किसान को 4000 रुपये देने का प्रावधान है जिसके मुताबिक किसी भी किसान को हर साल आठ हज़ार रुपये मिलेंगे. ये रकम सीधे किसान के खाते में जमा होगी.

केसीआर

इसके अलावा राजीव विद्या मिशन के तहत सरकारी हास्टलों में यूनिफ़ॉर्म, मैट और कंबल दिए जाने का प्रावधान है. दशहरे के मौके पर बड़े पैमाने पर महिलाओं के बीच भातुकम्मा साड़ी भी वितरित की जा रही है. जाति संबंधी आंकड़ों की मदद से केसीआर ने समुदाय विशेष की ज़रूरतों का ख़्याल रखने का काम किया है.

दरअसल, केसीआर की जनकल्याण योजनाएं, एनटीआर और वाईएसआर की योजनाओं का सामूहिक रूप है और इन सब योजनाओं के केंद्र में मुख्यमंत्री खुद रहे हैं.

बावजूद इन सबके केसीआर की आलोचना इस बात के लिए होती रही है कि वे कभी-कभार ही सचिवालय जाते हैं. उनकी आलोचना इस बात के लिए भी होती रही है कि वे अपने फ़ॉर्म हाउस से दरबार चलाते हैं. उनकी कैबिनेट में एक भी महिला शामिल नहीं है.

उनकी आलोचना इस बात के लिए भी होती है कि वे अपने बेटे, बेटी और भतीजे को राजनीति में बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन केसीआर इन सबका कोई जवाब नहीं देते.

चुनाव सबके लिए चुनौती भरा

टीआरएस सरकार जनकल्याण योजनाओं को बढ़ावा दे रही है, लेकिन साथ ही उस पर कर्ज़ भी बढ़ता जा रहा है.

बजट के मुताबिक मार्च, 2018 तक तेलंगाना सरकार का राजकोषीय घाटा एक लाख 80 हज़ार करोड़ रुपये का हो चुका है.

राज्य की 119 विधानसभा सीटों में टीआरएस ने महज़ 65 सीटें जीती थीं, लेकिन आज उनके दल में 90 विधायक हैं. 25 विधायक दूसरे दलों से आकर उनके साथ हुए हैं, इनमें कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी के विधायक भी शामिल हैं.

केसीआर ने वादा किया था कि तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा मिलने पर वे टीआरएस का विलय कांग्रेस पार्टी में कर देंगे, लेकिन उन्होंने अपना वादा नहीं निभाया. इतना ही नहीं उन्होंने अलग राज्य का श्रेय अपनी पार्टी के संघर्ष को दिया.

तेलंगाना के गठन को मंज़ूरी देने के बाद कांग्रेस आंध्र प्रदेश में भी ख़स्ताहाल हो गई. 2014 के चुनाव में कांग्रेस को आंध्र में एक भी विधानसभा सीट पर जीत नहीं मिली.

केसीआर

तेलंगाना में भी पार्टी नेतृत्व संकट के दौर से गुजर रहा है. मुख्यमंत्री पद के लिए 10 लोग दावेदार हैं. लेकिन किसी के पास जनाधार नहीं है. तेलंगाना जन समिति, एक साल पहले ही अस्तित्व में आई है और अभी शुरुआती दौर में ही है.

विपक्षी दलों की कमजोरी केसीआर की सबसे बड़ी ताक़त है. लेकिन विपक्षियों की सबसे बड़ी उम्मीद केसीआर परिवार में कलह की आशंका से है. केसीआर के बेटे केटीआर के आगमन से पहले उनके भतीजे हरीश राव पार्टी में नंबर दो की हैसियत में थे. लेकिन अब हालात बदल गए हैं.

पार्टी में केटीआर का दबदबा लगातार बढ़ रहा है. कुछ लोगों को इंतज़ार है कि असंतुष्ट हरीश रावत विद्रोह कर सकते हैं. लेकिन अब तक हरीश रावत अपने चाचा के सामने बेहद आज्ञाकारी बने हुए हैं. हाल में एक इंटरव्यू में हरीश राव ने कहा है कि अगर केटीआर मुख्यमंत्री बनते हैं तो भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी.

वैसे केसीआर ये भी कह चुके हैं कि वे अगर सत्ता में आते हैं तो दलित को मुख्यमंत्री बनाएंगे और अगर ऐसा नहीं कर पाते हैं तो लोग उन्हें पत्थर से पीट सकते हैं. सवाल उठता है कि क्या ये हक़ीक़त में होगा?

लोग हैदराबाद को घटनापूर्ण (हैपेनिंग प्लेस) कहते हैं, अब ये शहर वाक़ई हैपनिंग प्लेस में बदल गया है.

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