काल के कपाल पर वह लिखता मिटाता था

2
412

“काल के कपाल पर वह लिखता मिटाता था ,
गीत नया गाता था,
दुश्मन भी वार करने उनको ,एक बार सोचता था ,
गीत नया गाता था। ”
“मीत वह अपनी मन का ,सबको अपनाता था ,
गीत नया गाता था ,
शोहरत की शिखर पर हो कर भी ज़मीन पर चलता था ,
गीत नया गाता था। ”
“मौत अटल मगर वह खुद भी अटल था ,
गीत नया गाता था ,
शांति का दूत और मैत्री का वह परछाई था ,
और बिना थके ,बिना रोके ,
गीत नया गाता था। ”
” राष्ट्र और राष्ट्रीयता ,उसके सोच और समर्पण था ,
गीत नया गाता था,
आग का दरिया में ,वह मस्त मौला जैसे चलता था ,
गीत नया गाता गाता था। “

 

अंजन कुमार संभल द्वारा।

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY