स्वागत पर गदगद होकर देश का मान नहीं बढ़ा रहे मोदीजी

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||प्रणव प्रियदर्शी||

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन में प्रेस की मौजूदगी में इस बात को रेखांकित किया कि वह भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जिसे चीनी राष्ट्रपति ने पेइचिंग से बाहर आकर रिसीव किया। उन्होंने इसे भारत के गौरव से भी जोड़ा। यह कोई पहला मौका नहीं है जब मोदी ने इस तरह की बात सार्वजनिक तौर पर की हो। इससे पहले ब्रिटेन में उन्होंने ‘भारत की बात सबके साथ’ नाम से जो पार्टी प्रचार कार्यक्रम रखा था, जिसका लाइव प्रसारण भारतीय टीवी चैनलों पर किया गया था, उसमें भी उन्होंने बताया कि कैसे प्रिंस चार्ल्स ने खुद आकर उन्हें कॉमनवेल्थ समिट में शामिल होने का न्योता दिया और कैसे खुद महारानी ने उनसे आग्रह किया था कि इस बार समिट में उन्हें उपस्थित होना ही है। इसे भी उन्होंने अपना नहीं, देश के सवा सौ करोड़ लोगों का सम्मान बताया था।

इसे बदकिस्मती कहिए या खुशकिस्मती पर इस बात से तो इनकार नहीं ही किया जा सकता है कि मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। जाहिर है, इस पद पर रहते हुए उनके साथ जो भी होगा और वह दूसरों के साथ जो भी करेंगे, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देशवासियों का मान-सम्मान-अपमान उससे जुड़ा रहेगा। इसे वह बार-बार न कहें तो भी यह बात सच है और रहेगी। जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे और दुनियाभर में उन्हें एक विश्वनेता के रूप में देखा जाता था तो प्रकारांतर से उससे पूरे देश का मान बढ़ ही रहा था। भले पंडित नेहरू ने अपने मुंह से इस तथ्य की बार-बार दुहाई न दी हो कि वे संपूर्ण देशवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री को सम्मान मिले तो देश सम्मानित होता है। लेकिन प्रधानमंत्री अगर अपने बड़बोलेपन से या अपने छिछोरेपन से उस सम्मान की ऐसी-तैसी करने लग जाए तो देश अपमानित भी महसूस करता है। मोदीजी और उनके प्यार में पागल हो चुके लोग शायद इस सच को अभी महसूस न कर पाएं, लेकिन आप कल्पना करें किसी ऐसे अतिथि की जो आपके घर पधारा हो और आपके अभिवादन के जवाब में आपको बताने लग जाए कि आपने मुझे नमस्कार किया, नमस्कार करते हुए आप इतना झुके, जबकि मेरे भाई साहब पिछली बार आए थे तो आप इतना नहीं, उतना झुके थे, तो आपने जो मेरा यह अतिरिक्त सम्मान किया है वह मेरा नहीं, मेरे पूरे घर का सम्मान है वगैरह-वगैरह तो आप उस अतिथि के बारे में कैसी राय बनाएंगे?

सच्चाई यह है कि हर प्रधानमंत्री का विदेशों में आदर-सत्कार-सम्मान वगैरह किया जाता रहा है। हां उसमें तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति और विभिन्न देशों के बीच बदलते संबंधों के अनुरूप उन्नीस-बीस भी होता रहता है, पर कोई भी सरकार या प्रधानमंत्री इसे एक हद से ज्यादा महत्व नहीं देता। अगर इसके जरिए कोई कूटनीतिक संकेत दिया जा रहा हो तो उन संकेतों को स्पष्ट करने के लिए प्रेस रिपोर्टों में जरूर उसका उल्लेख होता है, पर प्रधानमंत्री अपने मुंह से सार्वजनिक रूप से उसका बखान करें, ऐसा ओछापन अब तक तो किसी प्रधानमंत्री ने नहीं दिखाया था। पर मोदीजी ऐसा कर रहे हैं और बार-बार कर रहे हैं। पार्टी में, सरकार में या नौकरशाही में भी, कोई ऐसा माई का लाल नहीं दिख रहा जो उन्हें यह बताए कि ऐसा करके वह खुद तो हंसी का पात्र बन ही रहे हैं, देश को भी गौरवान्वित नहीं कर रहे।

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