मानों इस लोकसभा का टर्म खत्म!

0
383

हरि शंकर व्यास

सोलहवीं लोकसभा का कार्यकाल मानों खत्म हुआ और केंद्र की मोदी सरकार अब जैसे-तैसे टाइम पास करती हुई! हां, यही है संसद के इस बजट सत्र से निकलता सार। क्या कोई मतलब बचा है इस लोकसभा का? कितनी अजीब बात है कि एक साल से ज्यादा का वक्त बाकी है लेकिन मोदी सरकार ने इस लोकसभा में आम बजट भी ऐसे पास कराया मानों अनुपूरक अनुदान की मांग (सप्लीमेंटरी डिंमांड्स) या वोट ऑन एकाउंट हो। आम बजट पर किसी तरह की कोई बहस नहीं हुई। उसे जैसे तैसे शोर के बीच में वॉयस वोट से स्पीकर ने पास करवाया। मुझे याद नहीं पड़ता है कि लोकसभा के इतिहास में ऐसा पहले कब हुआ जब सरकार की उम्र से सवा साल पहले ही संसद का बजट सत्र ऐसे जाया हुआ हो! इससे भी ज्यादा हैरानी वाली बात है कि अल्पमत वाले, लूले-लंगड़े विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने की हिम्मत पूर्ण बहुमत वाली सरकार नहीं जुटा पा रही है! टालमटोल, टाइमपास के लिए ये दांवपेच लड़ाने पड़ रहे हैं कि कैसे प्रायोजित हल्ला करवा कर अविश्वास प्रस्ताव को पेश नहीं होने दिया जाए। शोरगुल के बीच ऐसी हैंडिग बनवाई जाए जिससे यह बहस बने कि देखो भारत के नागरिकों की विदेश में मौत की खबर को भी विपक्ष सदन में सुनने को तैयार नहीं है!

सो अब सोलहवीं लोकसभा और संसद को आम चुनाव के मोड में आया माना जाए। पूरा मामला हैरतअंग्रेज है। तुक समझ नहीं आती कि जब लोकसभा में सरकार को जबरदस्त बहुमत है। मोदी सरकार के पास भारी भरकम वक्ता हैं। नारों का जवाब नारों से देने में भाजपा सासंद समर्थ हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मुंहतोड़ जवाब देने में समर्थ हैं मगर बावजूद इसके विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने की हिम्मत नहीं है। 13 दिन से लगातार यह सुना जा रहा है कि पांच-आठ मिनट का हल्ला और संसद की बैठक खत्म! यदि सवा साल पहले यह स्थिति है तो आगे के मानसून सत्र या शीतकालीन सत्र में भी हल्ला होता रहेगा और सरकार मुंह चुराए संसद कार्रवाई से भागी रहेगी।

उस नाते पिछले चार साल और यह साल भारत की मोदी सरकार का यह विचित्र संसदीय इतिहास लिखवाने वाला है कि बहुमत के बावजूद इस सरकार में अल्पमत वाली सरकारों से भी कम संसदीय बहस हुई। कम संसद चली। संसद में बहस, विचार और काम का रिकार्ड सर्वाधिक खराब रहा। क्या यह बात मोदी सरकार की उपलब्धि वाली होगी? या उसका यह मानना है कि यह विपक्ष के खाते की बदनामी होगी? पर संसद को चलाने, राजकाज को चलाने का दायित्व सत्ता पक्ष, सरकार का होता है। फिर अब तो संसदीय व्यवस्था की कोर बातों जैसे अविश्वास प्रस्ताव में भी गतिरोध दिख रहा है। यह दुनिया की सभी संसदीय व्यवस्थाओं का कायदा है, संसदीय लोकतंत्र की पहली जरूरत है कि यदि सरकार के खिलाफ अविश्वास आता है तो सारे काम छोड़ कर संसद में उस पर बहस होगी और सरकार उस प्रस्ताव के खिलाफ बहुमत साबित कर जतलाएगी कि उसका बहुमत बरकरार है। उस नाते मोदी सरकार को अपनी तह सदन में शांति बनवाने की व्यवस्था बनवा कर विपक्ष के प्रस्ताव पर विचार करवाना था। विपक्ष ने यदि इससे सरकार को घेरने की राजनीति की है तो सरकार को दो टूक बहुमत से विपक्ष को हरा कर मुंहतोड़ जवाब देना था।

कोई माने या न माने अपना मानना है कि इस लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जितना बहुमत है वह अगली लोकसभा में कतई नहीं हो सकता! भाजपा के लिए, और पिछली बीस-पच्चीस सालों की सरकारों के पूरे इतिहास में यह सरकार सर्वाधिक बहुमत लिए हुए है। इसके बावजूद यदि यह सरकार संसद को कामकाजी नहीं बना पाई, उसकी गरिमा, उसके मान-सम्मान में चार चांद नहीं लगवा सकी तो फिर अगली लोकसभा में क्या होगा? सोचंे, यदि इस 16 वीं लोकसभा के बहुमत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार के दबदबे और दस तरह की दंबगी के बावजूद यदि विपक्ष के आगे मुंह चुराने वाली रणनीति है तो आगे क्या बनना है?

अपना मानना है संसद और खास कर लोकसभा देश की विभिन्नताओं, अलग-अलग विचारधाराओं, मिजाज, चेहरों की प्रतिनिधी संस्था है तभी उसमें सरकार के इस कौशल की परीक्षा होती है कि वह कैसे सबको साथ ले कर चलती है? संसद को संभाल सकना ही सवा सौ करोड़ नागरिकों के प्रबंधन में प्रधानमंत्री की व्यवहारकुशलता, प्रबंध, समझ, सोच, सबको साथ ले कर चल सकने की तासीर होने या न होने का पता पडता है। उस नाते विचारणीय सवाल है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक के चार सालों के कार्यकाल में संसद का प्रबंधन कैसा रहा? यदि आज सवा साल पहले ही लोकसभा बेमतलब होती हुई लग रही है, वह वोट ऑन एकाउंट के अंदाज में काम करती हुई लगती है तो यह क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी अक्षमता का प्रमाण नहीं है?

इससे फिर साफ लग रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी विपक्षमय संसद को नहीं संभाल सकते हैं। 44 सांसदों की कांग्रेस को नहीं संभाल सकते हैं, छोटी-छोटी पार्टियों को मैनेज नहीं कर सकते हैं और ससंद में विपक्ष के आरोपों के आगे असहज रहते हैं। यदि यह है तब तो अगला चुनाव नरेंद्र मोदी को यह कहते हुए लड़ना चाहिए कि संसदीय व्यवस्था ठीक नहीं है। संसद से देश का चल सकना मुश्किल है। इसलिए भारत को लोकतंत्र वाली नहीं बल्कि चीन जैसी व्यवस्था चाहिए! तब नरेंद्र मोदी-अमित शाह को 2019 के अपने चुनाव घोषणापत्र में जनता को बताना चाहिए कि उनके राजकाज में बहुदलीय व्यवस्था बाधक है। सो या तो जनता उन्हे 545 में से 545 सीटे दे नहीं तो हम संसदीय प्रणाली को बदलने का फैसला लेंगे।

मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि सोशल मीडिया में, भक्त मीडिया में यह बात बार-बार कही जा रही है कि मोदी सरकार को काम नहीं करने दिया जा रहा है। हिंदू एजेंडे को पूरा करना राज्यसभा में सांसदों की कमी व लोकसभा में विपक्ष की मौजूदगी से असंभव है या यह कि विपक्ष शोर करके देश के पैसे की बरबादी कर दे रहा है। मतलब मौजूदा संसदीय व्यवस्था से बात नहीं बनती है। जाहिर है इस सबसे यह बहस, नेरेटिव बनना है कि मोदी सरकार को काम कहां करने दिया गया? मोदीजी चाहते थे बहुत कुछ करना लेकिन विरोधी सब एकजुट हो गए।

हां, लोकसभा और राज्यसभा में कुछ न होना भी इस हल्ले के मकसद से है कि देखो, देखो सब विरोधी इकठ्ठे हो गए। अब कोई पूछे कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष के खिलाफ जो भी है वह तो विपक्ष के वि में बंधा ही होगा। स्वस्थ लौकतंत्र तभी है जब विपक्ष से विरोध का सुर निकले। विपक्ष का सुर एकजुट, एक सा क्यों नहीं होगा? और फिर 16 वीं लोकसभा के विपक्ष में है क्या? बावजूद इसके तब भी यदि मुंह चुरा भागे रहने की नौबत है तो फिर संसद का मतलब क्या है? सचमुच कोई मतलब नहीं है और एक साल पहले ही 16 वीं लोकसभा कामचलाऊ, टाइमपास वाली हो गई है।

LEAVE A REPLY