भारत है भ्रष्टाचार का अक्षयपात्र!

0
274

विवेक सक्सेना                

सच कहूं कि जब नीरव मोदी के घोटाले की खबर सुनी तो उसे जानने में अपनी कोई इच्छा नहीं हुई। उसके बारे में महज उतना ही जानना था जितना कि कॉलम लिखने के लिए जरूरी था क्योंकि अखबारों व विभिन्न चौनलो ने पिछले दिनों जैसा उसका गुणगान किया तो सिर्फ इतना ही लिखना बाकी रह गया कि खुद हनुमानजी मंगलवार को उसके लिए व्रत रखते थे व शाम को उसका प्रसाद चढ़ाते थे!

चौनलों की यह मजबूरी है कि जब कोई मामला गर्म होता है तो वे पूरी ताकत उसमें झोंक देते हैं। याद है ना कि कुछ महीने पहले चौनलों पर किस तरह से हनीप्रीत व राम-रहीम छाए हुए थे? वे क्या खाते-पीते थे क्या पहनते थे। उनका जन्म कहा हुआ था वगैरह वगैरह। माना चौनल को कोई-न-कोई मुद्दा दिखाना ही रहता है। सच्चाई तो यह है कि पिछले दशकों में मैंने जो कुछ देखा व पढ़ा-सुना है उसके बाद मुझे ऐसी कोई भी घटना बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करती है।

शायद इसकी एक बड़ी वजह मेरी सोच व यह घटनाक्रम भी हो सकता है। मेरा मानना है कि नीरव मोदी सरीखे मामलों पर नजर डालने के पहले हमें थोड़ा पीछे लौटना पड़ेगा क्योंकि उसमें कुछ भी अनोखा नहीं है। इस देश की यह परंपरा रही है कि व्यक्ति जितना बड़ा होता हैं वह उतनी ही बड़ी झूठ में शामिल होता आया है। पहले सोमनाथ का मंदिर बार-बार लूटा गया जो कि अपने समय की सबसे बड़ी लूट बताई गई। काशी विश्वनाथ का मंदिर भी इसका शिकार हुआ।

अगर पर्यटक के रूप में जाएं तो पता चलता है कि कभी लाल किले में मयूर सिंहासन हुआ करता था जिनमें हीरे मोती जड़े हुए थे। अंग्रेंजो ने इस देश को जम कर चूना लगाया। उन्होंने तो अपने समय में दुनिया के सबसे बड़े नील के निर्यातक रहे भारत का कारोबार ही ठप करा दिया। वे अपने साथ दुनिया के सबसे चर्चित हीरो में से शुमार कोहिनूर हीरा साथ ले गए जिसे अब तक भारत वापस लाए जाने की मांग उठती रहती है।

जब देश आजाद हुआ तो तब सबसे बड़े नेता व हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में उनके सबसे करीबी व प्यारे व्यक्ति कृष्णा मेनन ने जीप स्कैडल कर डाला। उसने तब द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल की गई सैकड़ो जीपें ऊंची कीमत पर खरीद ली जिनमें से आधी कभी आई ही नहीं। इसके बावजूद तत्कालीन सरकार ने एक आयोग बना कर उसे क्लीन चिट दिलाने की कोशिश की।

तमाम विवादों के बावजूद यह व्यक्ति देश का रक्षामंत्री बना। जिसके कारण चीन के साथ युद्ध में भारत की करारी हार हुई। और यह सदमा नेहरू की असामायिक मौत की वजह बना। इसी काल में देश के जाने माने उद्योगपतियों जैसे मूंदड़ा व टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक ने करोड़ो के घोटाले करके सरकारी क्षेत्र को करोड़ों का चूना लगाया। इंदिरा गाधी के शासन काल में भी भ्रष्टाचार खूब फला फूला।

याद है ना कि किस तरह से जगन्नाथ मिश्र ने पटना का गांधी मैदान व रेलवे स्टेशन बैंक के पास गिरवी रखकर उससे लाखों का कर्ज ले लिया था। उसी दौरा में बैंक धोखाधडी कांड हुआ जिसमें एक व्यक्ति ने इंदिरा गांधी की आवाज बदल कर बैंक में मल्होत्रा को फोन किया और 65 लाख रुपए ले उड़ा। बाद में तमाम लोग पकड़े गए मगर हेराफेरी करने वाले, जांच कर्ता पुलिस इस्पेक्टर व मल्होत्रा की संदिग्ध हालात में मौत हो गई।

कभी 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को उसकी हैसियत बताने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जब ताशकंद समझौते के लिए मास्को गए थे तब अचानक उनकी मौत हो गई और सारी परंपराओं नियम कानूनों को ताक पर रखते हुए तत्कालीन रूसी नेतृत्व ने उनका पोस्टमार्टम कर उसका विसरा अपने पास रख उनके शरीर को भारत भेज दिया।

तब हमने क्या कर लिया? उनकी पत्नी व परिवार के सदस्य आज तक उनकी मौत पर शक प्रकट करते आए हैं। जिस देश में हर साल आम गरीब आदमी चंद लाख का बैंको का कर्ज अदा न करने के कारण शर्म व मजबूरी के कारण आत्महत्या कर रहा हो। उसी देश में एक साल पहले 5003 करोड़ रुपए का पैसा डूब जाने की रिपोर्ट पेश करने वाला पंजाब नेशनल बैंक बड़े अनजान से खुद को 11,400 करोड़ रुपए का चुना लगवा लेता है।

एक विवादास्पद कांग्रेंसी सांसद मणी कुमार सुब्बा हुआ करता था। उसके पास काफी पैसा था और हर नेता उससे वसूली किया करता था। एक बार मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिह राव के राजनीतिक सचिव जितेंद्र प्रसाद के बारे में खबर लिखी कि वे भी सुब्बा से माल लिया करते थे। उन्होंने खबर छपने के बाद मुझे बुलाया और काकीरी कबाब खिलाने के बाद कहा कि भाई वह तो धन पशु है। अगर मैंने भी अपनी चाय के लिए थोड़ा दूध निकाल लिया तो क्या गलत किया। अरे भाई कम-से-कम अपने दोस्तों की छोटी-मोटी हरकत की तो अनदेखी कर दिया करो। वे बिलकुल ठीक थे।

आज मुझे राजीव गांधी पर बहुत दया आती है जोकि बोफोर्स खरीद में महज 64 करोड की दलाली के आरोप में गिर गए व सत्ता गंवा बैठे। जब हर्षद मेहता का शेयर कांड हुआ तो लोग कहने लगे कि उससे बड़ा कांड तो हो ही नहीं सकता है। अगली सरकार में 1.66 लाख करोड़ का टू-जी घोटाला हो गया। पूर्व मंत्री राजा व सांसद कनिमोई को जेल की हवा तक खानी पड़ी मगर पिछले दिनों अदालत ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। राजा ने तो इस कांड पर किताब तक लिख डाली।

ऐसी घटनाओं से मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया की वो हैडिंग नजर आती है जिसमें लिखा गया था कि नो वन किल्ड जैसिका ऐसे में लगता है कि जिस सीबीआई के अफसरो के विदेश में कागजात छीन लिए जाते हो, जो सरकार के इशारे पर कभी किसी के खिलाफ ज्ञात स्त्रोतो से ज्यादा आय का मामला बनाती हो अथवा उन्हें बरी करती हो उस देश में कुछ भी हो सकता है। हमे विदेश में जमा कालाधन वापस आने की बात करना तो दूर रहा, उसके बारे में तो सोचना तक नहीं चाहिए।

अपने अनुभव के आधार पर मैं एक सर्वदलीय सुझाव देना चाहूंगा कि जैसे राष्ट्रपति व राज्यपाल की गाड़ी का कोई नंबर नहीं होता। उसके कार्यकाल में उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं होता यह सुविधा तो सभी राजनीतिज्ञो, अफसरशाहो व उद्योगपतियो को दे दी जानी चाहिए क्योंकि घोटाले के बाद हर दल यह साबित करने में जुट जाता है कि अभूत अपराधी तो पिछली सरकार का खासोखास था। सबको पता है कि उसके खिलाफ कुछ नहीं होगा व कितना भी बड़ा घोटाला क्यों ने हो जाए इस सोने की चिडिया भारत में उसका कुछ नही बिगड़ना। उसे तो कोई परिंदा पर तक नहीं मार सकता है।

LEAVE A REPLY